एक्टिया रेसिमोसा या सिमिसिफ्युगा
(ACTEA RACEMOSA OR CIMICIFUGA)
GENERALS AND PARTICULARS
व्यापक-लक्षण तथा मुख्य-रोग
(१) स्त्री-रोग में विशेष उपयोगी
i. हिस्टीरिया
ii. रजोधर्म तथा जरायु के रोग
iii. शारीरिक लक्षणों के दूबने
पर मानसिक लक्षण होनो
iv. तीसरे महीने गर्भपात होना
(2) गठिया (नमी के कारण शरीर की
मांसपेशियों, जोड़ों, सिर,
जरायु आदि में दर्द)
MODALITIES
प्रकृति :-
लक्षणों में कमी (Better)
* गर्म कपड़े पहनने से रोग में कमी
* खाने से रोग में कमी
लक्षणों में वृद्धि (Worse)
* रजोधर्म के दिनों में रोग-वृद्धि
*जितना अधिक रज-स्राव हो
उतना ही क्लेश का बढ़ना
"ठंड से रोग बढना
(१) डॉ० कैन्ट का कहना है कि इस औषधि की परीक्षा बहुत सीमति क्षेत्र में ही हुई है, परन्तु फिर भी कई रोगों में यह औषधि कारगर सिद्ध हुई है। इसकी मुख्य उपयोगिता स्त्रियों के रोगों में पायी जाती है जिनमें से मुख्य हिस्टीरिया तथा गठिया आदि वात-रोग हैं। हम यहां इनका वर्णन करेंगे।हिस्टीरिया के लक्षण-सोते समय मांस-पेशियों का कंपन तथा उससे अनिद्रा-ज्यों ही रोगिणी सोने के लिये बिस्तर पर लेटती है, तब जिस तरफ लेटती है उसी तरफ की मांस-पेशियों में कपंन होने लगता है। अगर वह पीठ के बल लेट जाती है, तो पीठ की मांस-पेशियों में कंपन शुरू हो जाता है, कन्धों में कंपन शरू हो जाता है। दायें, बांयें, सीधे-किसी तरफ लेटने से उसी तरफ कंपन का होना उसे बेचैन कर देता है और वह सो नहीं सकती। कभी कंपन, कभी सुन्न भाव, कभी दर्द-ठीक उस तरफ जिधर वह लेटती है-यह एक विलक्षण-लक्षण (Peculiar Symptom) है जो इस औषधि में पाया जाता है।रजोधर्म के दिनों में लक्षणों में वृद्धि-रजो-धर्म के विषय में रोगिणी से पूछना चाहिये कि उसके लक्षण रजोधर्म से पहले बढ़ते हैं, रजोधर्म के दिनों में बढ़ते हैं, घट या रजोधर्म के बाद बढ़ते हैं। प्राय: रजोधर्म हो जाने से स्त्रियों की तकलीफें जाती हैं, यह स्वाभाविक है। परन्तु ऐक्टिया रेसिमोसा का विशेष लक्षण यह है कि जब रजोधर्म हो रहा होता है, उस समय रोगिणी की तकलीफें बढ़ जाती हैं, और जितना ही अधिक रुधिर जारी होता है उतनी ही उसकी तकलीफें बढ़ती है। रजोधर्म के दिनों में स्त्री में उदासीनता, रुआई, अविश्वास, मांसपेशियों का कंपन,सुन्नभाव-जिधर लेटती है उधर ही ही मांस-पेशियां फड़कने लगती हैं, बैचनी से वह बिस्तर पर उठ बैठती है, सो नहीं सकती-ये सब उपद्रव रजोधर्म के दिनों में प्रकट होते हैं, और रजोधर्म के निकल जाने पर ये लक्षण भी जाते रहते हैं। लैकेसिसऔर जिंकम में ठीक इससे उल्टा होता है। इनमें रजोधर्म के होने से स्त्री उपद्रव शान्त हो जाते हैं, न होने पर बने रहते हैं।सब शारीरिक लक्षणों के दबने पर मानसिक-लक्षणों का प्रकट होना तथा मानसिक-लक्षणों के दबने पर शारीरिक-लक्षणों का प्रकट होना (Metasta-sis) कभी-कभी रोगी के शारीरिक लक्षणों को तेज दवाओं से दबा दिया जाता है.परन्तु वे दब कर और गहराई में जाकर मानसिक लक्षणों को उत्पन्न कर देते हैं।
उदाहरणार्थ अगर गठिये को दबा दिया जाय, तो रोगी का मानसिक-असतुलन हो जाता है, कभी-कभी गठिया भी ठीक हो जाता है, मानसिक संतुलन भी बना रहता है, परन्तु दस्त आने लगते हैं, पेट में दर्द होने लगता है, स्त्रियों में जरायु से रुधिरआने लगता है। इस प्रकार का स्रावों का प्रवाह रोग को शान्त बनाये रहता है।शारीरिक लक्षण हट कर मानसिक-लक्षण प्रकट होना या मानसिक लक्षण हट कर शारीरिक लक्षण प्रकट होना इस औषधि में पाया जाता है।ऐक्टिया रेसिमोसा की रोगिणी एक दिन आकर कहती है कि उसके सारे शरीर में दर्द होता है, जिस तरफ भी लेटे उस तरफ की मांस-पेशियां फड़कने लगती हैं.इस कारण वह उठ बैठती है, इसी कारण रात को नींद नहीं आती, अगली बार आकर अपने शारीरिक कष्ट की कोई बात नहीं कहती, सिर्फ इतना कहती है कि जी घबड़ाया रहता है, कुछ करने को जी नहीं करता, रो-रोकर अपना दिल हल्का करना चाहती है, कहती है रोने को जी करता है। शारीरिक लक्षणों के दब जाने पर मानसिक लक्षणों का प्रकट हो जाना और मानसिक लक्षणों के दब जाने पर शारीरिक लक्षणों का प्रकट होना इस औषधि का विशेष गुण है।WUNG ऐक्टिया रेसिमोसा तथा पल्सेटिला की तुलना-लक्षणों का इस प्रकार एक-दूसरे में परिवर्तन ऐक्टिया रेसिमोसा की तरह पल्सेटिला में भी पाया जाता है, परन्तु ऐक्टिया शीत-प्रधान औषधि है, पल्सेटिला ऊष्णता-प्रधान औषधि है।पल्सेटिला में रोग अपना स्थान बदलता है, रूप नहीं बदलता। अगर घुटने में दर्द है तो वह दर्द दूसरे घुटने में बाँह में या अन्य कहीं जा सकता है, परन्तु दर्द दर्द ही बना रहेगा, कोई और रूप धारण नहीं करेगा। ऐक्टिया रेसिमोसा में दर्द दबकर मानसिक रूप धारण कर लेता है-उदासी, निराशा, रोना, जीवन से उपरामता आदि ।
इस दृष्टि से ऐक्टिया रेसिमोसा की एब्रोटेनम से तुलना की जा सकती है, परन्तु उसमें एक शारीरिक लक्षण दब कर दूसरा शारीरिक लक्षण-बिल्कुल नया लक्षण-प्रकट हो जाता है, मानसिक लक्षण नहीं। उदाहरणार्थ, एब्रोटेनम में दस्त दब कर गठिया हो जायगा, बवासीर हो जायगी, कर्णमूल दब कर पोते बढ़ जायेंगे।ऐक्टिया रेसिमोसा का एब्रोटेनम की अपेक्षा मन पर, स्नायु-मंडल पर अधिक प्रभाव है।
ऐक्टिया रेसिमोसा और इग्नेशिया की तुलना-लक्षणों की परिवर्तनशीलता इग्नेशिया में भी पायी जाती है। इग्नेशिया भी ऐक्टिया की तरह शीत-प्रधान है,परन्तु भेद यह है कि इग्नेशिया की बीमारी अधिकतः दुःख के कारण होती है।किसी का पति मर गया, किसी की स्त्री मर गई, कोई अतृप्त प्रेम से व्याकुल है।इस प्रकार के दुःख जनित रोगों में इग्नेशिया व्यवहृत होती है।
तीसरे महीने गर्भपात हो जाना तथा प्रसव सहज होना-डॉ० क्लार्क कहते हैं कि अगर तीसरे महीने गर्भपात हो जाता हो, तो ऐसी दशा में प्रसव के एक या दो मास पूर्व से अगर गर्भवती स्त्री को ऐक्टिया रेसिमोसा की ३x की मात्रा प्रति ३ घंटे सेवन कराई जाय, तो गर्भपात नहीं होता। सैबाइना भी तीसरे महीने के गर्भपात को रोकता है। पांचवें या सातवें महीने गर्भपात होता हो, तो सीपिया ३० की प्रति चार घंटे के बाद मात्रा सेवन कराई जाय तो गर्भपात नहीं होता। जिन स्त्रियों को स्वभावतः गर्भपात हो जाता है उन्हें वाइबरनम के मदर टिंचर के ४-५ बूंद प्रतिदिन देने चाहियें।
डॉ० कैन्ट का कथन है कि यद्यपि अनेक बार ऐक्टिया रेसिमोसा के देने से प्रसव में आसानी हो जाती है, तो भी इसे रुटीन की तरह देना होम्योपैथी नहीं है। रोगी के अन्य लक्षणों को भी ध्यान में रखना चाहिये। यह ठीक है कि प्रसव के अन्तिम दिनों में इसे देने से प्रसव-पीड़ा में न्यूनता आती है।ऐक्टिया रेसिमोसा तथा कॉलोफाइलम-जैसे डॉ० क्लार्क ने ऐक्टिया रेसिमोसा के विषय में लिखा है कि प्रसव के कुछ दिन पहले इसे देने से प्रसव एक आसानी से हो जाता है, वैसे डॉ० डगलस बोरलैंड का कहना है कि प्रसव के मास पूर्व से कॉलोफाइलम की निम्न-शक्ति की एक मात्रा प्रतिदिन देने से प्रसव में कोई पीड़ा नहीं होती और बच्चा आसानी से हो जाता है।
(२) गठिया-इसका रोगी शीत-प्रधान होता है, सर्द और नम हवा से उसके शरीर में गठिये के रोग की दशा उत्पन्न हो जाती है, केवल मांसपेशियों और जोड़ों में ही दर्द नहीं होता, सारे शरीर में दर्द होने लगता है, स्नायु-मार्ग में, नसों में दर्द होता है। यकृत् और जरायु में भी नम-मौसम के शीत से दर्द होता है, सारे शरीर में इस शीत से दर्द होता है, परन्तु सिर में वह ठंडी हवा चाहता है। रोगी शीत-प्रधान-यह है-यह तो रोगी का 'व्यापक' (General) रूप है, परन्तु सिर ठंडक चाहता है-रोगी का 'एकांगी' (Particular) रूप है। यह हम पहले ही कह चुके हैं कि जब रोगी के शारीरिक-कष्ट-गठिये का दर्द आदि-दब जाते हैं तब उसके मानसिक कष्ट-हतोत्साह, निराशा, रुआई-आदि प्रकट होने लगते हैं, और जब उसके मानसिक-कष्ट प्रकट होते हैं तब उसके शारीरिक कष्ट दब जाते हैं।दृष्टि से इसे 'मूर्छा तथा वात-ग्रस्त प्रकृति' (Hysterio rheumatic constitution)का रोगी कह सकते हैं।
(३) इस औषधि के अन्य लक्षण-
1. प्रसव के बाद ठंड लग जाने से पागलपन या डिलीरियम इस-
i. प्रसव के बाद जरायु के नियमित संकोचन के न होने से मैले-पानी (Lochia)या नारबेल (Placenta) के न निकलने पर इसे दिया जाता है।
ii. जरायु में दर्द (Ulterine neuralgia) जो कभी एक और कभी दूसरी ओर जाता है, इसके लिये यह महौषध है। यदि यह दर्द दाई तरफ से बाई तरफ जाय,तो लाइकोपोडियम और अगर बाई तरफ से दाहिनी तरफ जाय, तो इपिकाक या लैकेसिस उपयोगी है।
iii. रजोधर्म की खराबी के कारण शरीर में बिजली के शॉक (धक्के) के समान स्नायु-शूल (Neuralgia) को यह ठीक करता है।
iv. जरायु से संबद्ध सिर-दर्द ऐक्टिया का सिर-दर्द आंख से शुरू होकर सिर की चोटी या उसके ठीक पीछे सिर की गुद्दी तक फैल जाता है; स्पाइलेजिया का सिर-दर्द सिर के पीछे की बाई तरफ से शुरू होकर, सिर के ऊपर चोटी से होता हुआ बाई आंख पर आ टिकता है। ऐक्टिया रेसिमोसा का सिर-दर्द दिन की अपेक्षा रात को अधिक होता है; इसके विपरीत स्पाइजेलिया का सिर दर्द दिन को अधिक होता है, सूर्योदय से प्रारंभ होता है और सूर्यास्त तक बना रहता है। प्रतिदिन ठीक एक ही समय बाई आंख के आस-पास दर्द हो तो सिडून उपयोगी है।
(४) शक्ति तथा प्रकृति-डॉ० कैन्ट कहते हैं कि यह औषधि ३०, २००,
१००० तथा इससे भी ऊंची शक्ति में अच्छा काम करती है। औषधि
'सर्द' - Chilly - प्रकृति के लिये है।
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