एलूमेन-फिटकरी, (ALUMEN) use in hindi


एलूमेन-फिटकरी, (ALUMEN)

GENERALS AND PARTICULARS

व्यापक-लक्षण तथा मुख्य-रोग

(१) मलद्वार में लकवे-की-सी कमज़ोरी

(२) मूत्राशय में पक्षाघात की सी कमज़ोरी

(३) शोथग्रस्त त्वचा, जिह्वा, गुह्य-द्वार,

जरायु या फोड़े का कड़ा पड़ जाने की तरफ रुझान (कैंसर)

(४) टांसिल, स्तन आदि ग्रन्थियों का कड़ा पड़ जाना

(५) वृद्ध पुरुषों की खांसी


MODALITIES. (प्रकृति)

लक्षणों में कमी (Better)

* सिर-दर्द में गर्मी से कमी लक्षणों में वृद्धि (Worse)

* ठंड से रोग में वृद्धि (सिर दर्द को छोड़ कर क्योंकि सिर-

दर्द गर्मी से कम हो जाती है)

* निद्रा में रोग का बढ़ जाना

* दाईं तरफ लेटने से रोग में वृद्धि


(१) मल-द्वार में लकवे की-सी कमजोरी ( दस्त के लिये भी ज़ोर लगाना, सख्त कब्ज़ ) - इस औषधि में मल-द्वार में ऐसी कमज़ोरी होती है मानो पक्षाघात (Paralysis), लकवा हो गया हो। गुदा की क्रियाशीलता समाप्त हो जाने के कारण, मल गुदा में चिपट जाता है। कोलन में से मल निकलता ही नहीं। जो मल निकलता है वह अत्यन्त कठोर, सूखा हुआ, पत्थर की तरह गांठों वाला होता। मल सप्ताह में एक बार या दो बार निकलता है।


(२) मूत्राशय में लकवे, पक्षाघात की-सी कमज़ोरी-जैसे मल-द्वार शिथिल पड़ जाता है, वैसे मूत्राशय में भयंकर शिथिलता आ जाती है। मूत्र बड़ी कठिनाई से निकलता है। पेशाब कर लेने के बाद भी मूत्राशय अधभरा ही रह जाता है। पहले तो मूत्र का प्रवाह शुरू होने में ही बहुत देर लग जाती है, और जब मूत्र आना प्रारंभ होता है, तो मूत्र नली से नीचे सीधी एक धार में गिरता है, वेग से जैसा आगे की तरफ गिरना चाहिये वैसा नहीं गिरता । इस का कारण मूत्राशय की प्रणाली का पक्षाघात अर्थात् लकवे की-सी अवस्था का होना है जिस से मूत्राशय मूत्र के वेग को आगे की तरफ नहीं धकेल पाता।


(३) शोथग्रस्त त्वचा, जिह्वा, गुह्य-द्वार, जरायु या फोड़े का कड़ा पड़ जाने की तरफ रुझान जिससे कैंसर बनता है-इस औषधि में त्वचा के कड़ा पड़ जाने (Induration) की प्रवृत्ति है। जहाँ त्वचा में शोथ होगी वहां वह कड़ी पड़ जायगी। जिन औषधियों में भी त्वचा के कड़ा पड़ जाने की प्रवृत्ति पायी जाती है,वहां कम-अधिक रूप में कैंसर हो जाया करता है क्योंकि कैंसर का मुख्य आधार कड़ेपन की प्रवृत्ति है। जब ज़ख्म कड़ा पड़ने लगे तो समझना चाहिये कि वह कैंसर

में परिणत हो सकता है। यह कड़ापन बढ़ता बढ़ता कैंसर बन जाता है।जरायु ऐसे ज़ख्म त्वचा पर कहीं भी हो सकते हैं, जिह्वा पर, गुह्य-द्वार में, में हो सकते हैं। इनका शुरू में ही उपचार एलूमेन द्वारा होने से रोगी कैंसर से बच जाता है।


(४) टांसिल, स्तन आदि ग्रन्थियों का कड़ा पड़ जाना-जैसे त्वचा में जिह्वा आदि में कड़ापन आ जाता है, वैसे शरीर की ग्रन्थियों में टांसिल, स्तन आदि में-भी ये ग्रन्थियां गोली की तरह कड़ी पड़ जाती हैं। यह प्रवृत्ति टांसिलों में विशेष उसे कड़ा रूप से पायी जाती है। जिन लोगों की ठंड सीधी टांसिल में बैठ जाती है,कर देती है, उनके रोग एलूमेन ठीक कर देता है यह स्मरण रखना चाहिये कि टांसिल के कड़ा होने की प्रवृत्ति जैसे एलूमेन में पायी जाती है, वैसे ही यह प्रवृत्ति बैराइटा कार्ब में भी पायी जाती है। कड़े टांसिल में बैराइटा कार्ब भी उत्तम

औषधि है।

(५) वृद्ध पुरुषों की खाँसी-जिन वृद्धों की छाती में कफ बैठ जाता है,कठिनाई से निकलता है, लम्बी-लम्बी तार से निकलता है, उसे यह ठीक कर देता है। यह लक्षण एन्टिम टार्ट में भी है।

(६) शक्ति तथा प्रकृति - ३०, २०० या इस से भी ऊँची (यह दीर्घकालिक एण्टी-सोरिक दवा है। औषधि 'सर्द' - Chilly - प्रकृति के लिये है)

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एसक्यूलस (Aesculus Hippocastanum)use in hindi



एसक्यूलस (Aesculus Hippocastanum)

GENERALS AND PARTICULARS

व्यापक-लक्षण तथा मुख्य-रोग

(१) मल-द्वारा-शिराओं में रक्त-संचय (बवासीर तथा गले, पेट, फेफड़े,आंख आदि की शिराओं में रक्त-संचय से उनमें फूला-फूलापनअनुभव करना-Fullness)

(२) कमर-दर्द-कमर के नीचे की हड्डी (त्रिकास्थि) में दर्द जिसे चिनका पड़ जाना कहते हैं |

(३) दर्द का स्थान परिवर्तन करना |

MODALITIES (प्रकृति)

लक्षणों में कमी (Better)*बवासीर का खून निकलने से

*ठंड से रोग में कमी

लक्षणों में वृद्धि (Worse)*प्रात:काल रोग बढ़ना

"ठंडी हवा में सांस लेने से

*शौच या पेशाब के बाद हिलने-डुलने तथा घूमने से

(१) मल-द्वार की शिराओं (Veins) में रक्त-पंचय (बवासीर) -हमारे शरीर में दो प्रकार की रक्त-वाहिनी नाड़ियां हैं-'धमनियां' (Arteries) तथा' शिराएँ' (Veins)। धमनियों में शुद्ध-रक्त बहता है, शिराओं में अशुद्ध-रक्त-नीला रक्त-बहता है, जो पहले हृदय में इकट्ठा होता है, वहां से शुद्ध होने के लिये फेफड़ों में जाकर फिर हृदय में लौटता है। फेफड़ों में से ऑक्सीजन लेकर वह शुद्ध,अर्थात् लाल रंग का होकर फिर हृदय में आ जाता है, और वहां से धमनियों द्वारा पुनः शरीर में संचार करता है। जब शरीर की मांस पेशियों ढीली पड़ जाती हैं, तब शिराओं में भी शिथिलता आ जाती है, और जहां शिराओं का समूह अधिक तौर से होता है, वहां अशुद्ध-रक्त ले जाने वाली इन शिराओं (Veins) में अशुद्ध रक्त इकट्ठा हो जाता है। अशुद्ध-रक्त के एक स्थान पर इसी संचय को 'शिरा-रक्त संचय' (Venous stasis) या 'शिरा-रक्त-शोथ' (Varicose Veins) कहते हैं। इसी-शिरा-रक्त-शोध' से बवासीर की उत्पत्ति होती है।

यह बवासीर दो प्रकार की होती है-बादी बवासीर और खूनी बवासीर,प्रायः बादी में अधिक उपयोग है-बवासीर में कभी खून आता है, कभी नहीं आता। एसक्यूलस प्रायः बादी बवासीर में, जिसमें खून आता, अधिक उपयोगी है.परन्तु खूनी बवासीर में भी यह लाभ पहुँचाती है। इस दवा का कार्य क्षेत्र बहुत विस्तृत नहीं है, परन्तु बवासीर तथा जहां-जहां शिराओं में रक्त संचय की शिकायत हो, वहां-वहां इसका कार्य निस्सन्दिग्ध है। क्योंकि एसक्यूलस का प्रभाव 'शिराओं'(Veins) पर होता है इसलिये जहां-जहां लाल-नीले (Purple) रंग का रुधिर दीखे,बवासीर के मस्सों में, घाव में, कहीं भी, वहां-वहां यह उपयोगी औषधि है।खून बवासीर में कोलिनसोनिया उत्कृष्ट दवा है। कोलिनसोनिया से लाभ होने के बाद जो कुछ शेष रहे, उसे एसक्यूलस ठीक कर देता है। इसी प्रकार नक्स वोमिका तथा सल्फर से जब रोग में कमी आ जाय, और बवासीर में पूरा लाभ न हो, तब एसक्यूलस बचे हुए रोग को समाप्त कर देता है।बवासीर के विषय में विचार करते हुए एलो, ब्रोमियम तथा म्यूरियेटिक एसिड को भी ध्यान में रखना चाहिये। इनका वर्णन हमने एलो पर लिखते हुए किया है।

        रक्त संचय के कारण किसी अंग में भारी-भारीपन (Sense of full-ness) अनुभव करना-इस औषधि का विशेष लक्षण यह है कि शिराओं के रक्त-संचय के कारण रोगी किसी भी अंग में भारी-भारीपन, फूलापन (Fullness)अनुभव करता है। बवासीर में क्योंकि गुदा की शिराओं में नीला रक्त संचित हो जाता है, इसलिये वहां पर रोगी को भारीपन अनुभव होता है, हल्कापन अनुभव नहीं होता।मल-द्वार में भारीपन अनुभव करना इस औषधि का विशेष लक्षण है।मलद्वार में तिनके से ठुसे अनुभव होना-मलद्वारा का स्थान नीचे की ओर है, इसलिये जब वहां की शिराओं में अशुद्ध-रक्त संचित हो जाता है, ऊपर की तरफ नहीं लौटता, तब रोगी को ऐसा अनुभव होता है जैसे मल-द्वार में तिनके से ठुसे हुए हों। इस औषधि का केन्द्र-स्थान गुदा प्रदेश है, और जिन व्यक्तियों की रुधिर-प्रणालिकाएँ अधिक फूली रहती हैं (Plethoric individuals) उनमें इस प्रकार के अनुभव विशेष तौर पर पाये जाते हैं।एसक्यूलस तथा नाइट्रिक एसिड की तुलना-इस औषधि में गुदा में तिनके चुभे-से अनुभव होते हैं, नाइट्रिक एसिड में ऐसा अनुभव होता है कि शौच करते समय गुदा में कहीं हड्डी का टुकड़ा चुभ रहा है। इन दोनों में भेद यह है कि' एसक्यूलस में तो शौच करने के कुछ घंटे के बाद चुभन का दर्द प्रारंभ होता है |

नाइट्रिक एसिड में शौच करते समय और शौच करने के कई घंटे बाद तक यह चुभन बनी रहती है। नाइट्रिक एसिड में खूनी बवासीर होती है, एसक्यूलस में नीले रंग के बाहर निकले हुए बड़े मस्मे होते हैं जिनमें चाकू से काटने जैसा दर्द होता है और इसमें रोगी न खड़ा रह सकता है, न लेटा सकता है, न बैठ सकता है, बैठ सकता है, तो केवल घुटनों के बल।मुख, गले, पेट, फेफड़े आंख आदि की शिराओं में रक्त-संचय से उनमें फूला-फूलापन अनुभव करना-जैसे गुदा की शिराओं में रक्त संच से फूलापन अनुभव होता है, वैसे मुख की या गले की शिरओं में भी रक्त-संचय के कारण फूलापन अनुभव होता है। इसी प्रकार का अनुभव पेट में हृदय में, फेफड़ों में भी' फूलापन' (Fullness) प्रतीत होने पर एसक्यूलस उपयोगी औषधि है। गले को देखने से गला नीली शिराओं से भरा दीखता है। आँखों में भी शिराओं की सूजन से, उनमें रक्त संचय से जो कष्ट उत्पन्न हो जाता है उसके लिये यह उत्तम है।

(२) कमर के नीचे की त्रिकास्थित (Sacrum) में दर्द जिसे चिनका पड़ना कहते हैं- इस औषधि की मुख्य क्रिया गुदा-प्रदेश तथा पीठ के नीचे के स्थान में जिसे त्रिकास्थि (Sacrum) कहते हैं वहां पर दिखलाई देती है। त्रिकास्थि का स्थान रीढ़ की अन्तिम हड्डी (Coccyx) के ठीक ऊपर है। कमर के नीचे इस हड्डी में दर्द होना जो चलने-फिरने, हिलने-डोलने तथा झुकने से बढ़ जाय इस औषधि का विशिष्ट लक्षण है। पीठ में चिनका पड़ जाने पर यह औषधि उपयुक्त है। पीठ के दर्द के कारण रोगी सब काम-धंधे छोड़ बैठता है। कमर दर्द की यह अत्युत्तम औषधि है।

कमर के नीचे के हिस्से के दर्द में एसक्यूलस तथ एगैरिकस की तुलना-कमर के नीचे के हिस्से में (In sacral region) दर्द इन दोनों औषधियों में .है, परन्तु एगैरिकस में कमर-दर्द बैठी हालत में होता है, चलते-फिरते रहने से चला जाता है, एसक्यूलस में यह दर्द बैठी हुई हालत से उठने या झुकने से. या चलने-फिरने से यह हरकत करने से होता है। रोगी एक तरह का लंगड़ापन(Lameness) अनुभव करता है, यह अनुभव कूल्हे या टांग तक जाता है।एसक्यूलस के कमर-दर्द का वर्णन करते हुए कहा जाता है: (Lameness in the lower back which gives out when walking.)

(३) दर्द का स्थान परिवर्तन करना-इस औषधि में दर्द स्थान परिवर्तन करती रहती है, कभी इधर, कभी उधर। कभी-कभी ये दर्द स्नायु के मार्ग पर होती हैं। पल्सेटिला तथा कैली कार्ब में भी इस प्रकार की स्थान परिवर्तन करने वाली दर्द पायी जाती है। पल्सेटिला तथा एसक्यूलस दोनों ऊष्णता-प्रधान औषधियां हैं, दोनों ठंड को पसंद करती हैं, दोनों में दर्द स्थान परितर्वन करता रहता ऊष्णता-प्रधान होने पर भी दोनों दर्द के स्थान में गर्मी को पसन्द करती हैं। इसी प्रकार सिकेल भी ऊष्णता-प्रधान रोगी है, ठंड को पसन्द करता है, परन्तु दर्द वाले स्थान पर गर्मी चाहता है। कैम्फर का रोगी भी दर्द की हालत में कमरा बन्द चाहता है, परन्तु दर्द हटते ही कपड़े उतार फेंकता है और कमरे के दरवाजे तथा खिड़कियां खोल देना चाहता है। रोगी का ऊष्णता-प्रधान होने के कारण ठंड चाहना 'व्यापक'(General) लक्षण है, और दर्द के स्थान पर गर्मी चाहना 'एकांगी' (Particular)लक्षण है।एसक्यलूस में गुदा के लक्षणों की प्रधानता होती है, पल्सेटिला में पेट के लक्षणों की प्रधानती होती है, पल्सेटिला की स्त्री मोटी होती है, सिकेल की स्त्री पतली-दुबली, झुरियों वाली होती है। सिकेल का रोगी ठंड चाहता है, कैम्फर का रोगी भी ठंड चाहता है, परन्तु भेद यह है कि कैम्फर का रोगी जब कपड़े उतार फेंकता है तब उसे फिर ठंड लगने लगती है, जब कपड़े से अपने को ढक लेता है तब एकदम गर्मी का दौर होने लगता है।

(४) इस औषधि के अन्य लक्षण-

i. ठंडी हवा में सांस लेते समय हवा का नाक में लगना (जुकाम) -डॉ० नैश कहते हैं कि ऐसे जुकाम में जो आर्सेनिक के लक्षणों जैसा हो, जिसमें पतला पनीला, जलन वाला जुकाम हो और ठंडी हवा में सांस लेने से जो नाक में लगता हो (Sensitive to inhaled cold air) - ऐसे जुकाम को यह ठीक करती है।

iii. प्रदर में जब कमर कमजोर अनुभव हो और चलने में टांगें थकी-थकी महसूस हों, थोड़ी दूर भी चलना भारी प्रतीत हो, ऐसे प्रदर को यह ठीक करती है।

(६) शक्ति तथा प्रकृति-३, ६, ३० ( औषधि 'गर्म'-Hot-है)

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एक्टिया रेसिमोसा या सिमिसिफ्युगा(ACTEA RACEMOSA OR CIMICIFUGA) use in hindi



एक्टिया रेसिमोसा या सिमिसिफ्युगा

(ACTEA RACEMOSA OR CIMICIFUGA)

GENERALS AND PARTICULARS

व्यापक-लक्षण तथा मुख्य-रोग

(१) स्त्री-रोग में विशेष उपयोगी

i. हिस्टीरिया

ii. रजोधर्म तथा जरायु के रोग

iii. शारीरिक लक्षणों के दूबने

पर मानसिक लक्षण होनो

iv. तीसरे महीने गर्भपात होना

(2) गठिया (नमी के कारण शरीर की

मांसपेशियों, जोड़ों, सिर,

जरायु आदि में दर्द)

MODALITIES

प्रकृति :-

लक्षणों में कमी (Better)

* गर्म कपड़े पहनने से रोग में कमी

* खाने से रोग में कमी

लक्षणों में वृद्धि (Worse)

* रजोधर्म के दिनों में रोग-वृद्धि

*जितना अधिक रज-स्राव हो

उतना ही क्लेश का बढ़ना

"ठंड से रोग बढना

(१) डॉ० कैन्ट का कहना है कि इस औषधि की परीक्षा बहुत सीमति क्षेत्र में ही हुई है, परन्तु फिर भी कई रोगों में यह औषधि कारगर सिद्ध हुई है। इसकी मुख्य उपयोगिता स्त्रियों के रोगों में पायी जाती है जिनमें से मुख्य हिस्टीरिया तथा गठिया आदि वात-रोग हैं। हम यहां इनका वर्णन करेंगे।हिस्टीरिया के लक्षण-सोते समय मांस-पेशियों का कंपन तथा उससे अनिद्रा-ज्यों ही रोगिणी सोने के लिये बिस्तर पर लेटती है, तब जिस तरफ लेटती है उसी तरफ की मांस-पेशियों में कपंन होने लगता है। अगर वह पीठ के बल लेट जाती है, तो पीठ की मांस-पेशियों में कंपन शुरू हो जाता है, कन्धों में कंपन शरू हो जाता है। दायें, बांयें, सीधे-किसी तरफ लेटने से उसी तरफ कंपन का होना उसे बेचैन कर देता है और वह सो नहीं सकती। कभी कंपन, कभी सुन्न भाव, कभी दर्द-ठीक उस तरफ जिधर वह लेटती है-यह एक विलक्षण-लक्षण (Peculiar Symptom) है जो इस औषधि में पाया जाता है।रजोधर्म के दिनों में लक्षणों में वृद्धि-रजो-धर्म के विषय में रोगिणी से पूछना चाहिये कि उसके लक्षण रजोधर्म से पहले बढ़ते हैं, रजोधर्म के दिनों में बढ़ते हैं, घट या रजोधर्म के बाद बढ़ते हैं। प्राय: रजोधर्म हो जाने से स्त्रियों की तकलीफें जाती हैं, यह स्वाभाविक है। परन्तु ऐक्टिया रेसिमोसा का विशेष लक्षण यह है कि जब रजोधर्म हो रहा होता है, उस समय रोगिणी की तकलीफें बढ़ जाती हैं, और जितना ही अधिक रुधिर जारी होता है उतनी ही उसकी तकलीफें बढ़ती है। रजोधर्म के दिनों में स्त्री में उदासीनता, रुआई, अविश्वास, मांसपेशियों का कंपन,सुन्नभाव-जिधर लेटती है उधर ही ही मांस-पेशियां फड़कने लगती हैं, बैचनी से वह बिस्तर पर उठ बैठती है, सो नहीं सकती-ये सब उपद्रव रजोधर्म के दिनों में प्रकट होते हैं, और रजोधर्म के निकल जाने पर ये लक्षण भी जाते रहते हैं। लैकेसिसऔर जिंकम में ठीक इससे उल्टा होता है। इनमें रजोधर्म के होने से स्त्री उपद्रव शान्त हो जाते हैं, न होने पर बने रहते हैं।सब शारीरिक लक्षणों के दबने पर मानसिक-लक्षणों का प्रकट होना तथा मानसिक-लक्षणों के दबने पर शारीरिक-लक्षणों का प्रकट होना (Metasta-sis) कभी-कभी रोगी के शारीरिक लक्षणों को तेज दवाओं से दबा दिया जाता है.परन्तु वे दब कर और गहराई में जाकर मानसिक लक्षणों को उत्पन्न कर देते हैं।

उदाहरणार्थ अगर गठिये को दबा दिया जाय, तो रोगी का मानसिक-असतुलन हो जाता है, कभी-कभी गठिया भी ठीक हो जाता है, मानसिक संतुलन भी बना रहता है, परन्तु दस्त आने लगते हैं, पेट में दर्द होने लगता है, स्त्रियों में जरायु से रुधिरआने लगता है। इस प्रकार का स्रावों का प्रवाह रोग को शान्त बनाये रहता है।शारीरिक लक्षण हट कर मानसिक-लक्षण प्रकट होना या मानसिक लक्षण हट कर शारीरिक लक्षण प्रकट होना इस औषधि में पाया जाता है।ऐक्टिया रेसिमोसा की रोगिणी एक दिन आकर कहती है कि उसके सारे शरीर में दर्द होता है, जिस तरफ भी लेटे उस तरफ की मांस-पेशियां फड़कने लगती हैं.इस कारण वह उठ बैठती है, इसी कारण रात को नींद नहीं आती, अगली बार आकर अपने शारीरिक कष्ट की कोई बात नहीं कहती, सिर्फ इतना कहती है कि जी घबड़ाया रहता है, कुछ करने को जी नहीं करता, रो-रोकर अपना दिल हल्का करना चाहती है, कहती है रोने को जी करता है। शारीरिक लक्षणों के दब जाने पर मानसिक लक्षणों का प्रकट हो जाना और मानसिक लक्षणों के दब जाने पर शारीरिक लक्षणों का प्रकट होना इस औषधि का विशेष गुण है।WUNG ऐक्टिया रेसिमोसा तथा पल्सेटिला की तुलना-लक्षणों का इस प्रकार एक-दूसरे में परिवर्तन ऐक्टिया रेसिमोसा की तरह पल्सेटिला में भी पाया जाता है, परन्तु ऐक्टिया शीत-प्रधान औषधि है, पल्सेटिला ऊष्णता-प्रधान औषधि है।पल्सेटिला में रोग अपना स्थान बदलता है, रूप नहीं बदलता। अगर घुटने में दर्द है तो वह दर्द दूसरे घुटने में बाँह में या अन्य कहीं जा सकता है, परन्तु दर्द दर्द ही बना रहेगा, कोई और रूप धारण नहीं करेगा। ऐक्टिया रेसिमोसा में दर्द दबकर मानसिक रूप धारण कर लेता है-उदासी, निराशा, रोना, जीवन से उपरामता आदि ।

इस दृष्टि से ऐक्टिया रेसिमोसा की एब्रोटेनम से तुलना की जा सकती है, परन्तु उसमें एक शारीरिक लक्षण दब कर दूसरा शारीरिक लक्षण-बिल्कुल नया लक्षण-प्रकट हो जाता है, मानसिक लक्षण नहीं। उदाहरणार्थ, एब्रोटेनम में दस्त दब कर गठिया हो जायगा, बवासीर हो जायगी, कर्णमूल दब कर पोते बढ़ जायेंगे।ऐक्टिया रेसिमोसा का एब्रोटेनम की अपेक्षा मन पर, स्नायु-मंडल पर अधिक प्रभाव है।

ऐक्टिया रेसिमोसा और इग्नेशिया की तुलना-लक्षणों की परिवर्तनशीलता इग्नेशिया में भी पायी जाती है। इग्नेशिया भी ऐक्टिया की तरह शीत-प्रधान है,परन्तु भेद यह है कि इग्नेशिया की बीमारी अधिकतः दुःख के कारण होती है।किसी का पति मर गया, किसी की स्त्री मर गई, कोई अतृप्त प्रेम से व्याकुल है।इस प्रकार के दुःख जनित रोगों में इग्नेशिया व्यवहृत होती है।

तीसरे महीने गर्भपात हो जाना तथा प्रसव सहज होना-डॉ० क्लार्क कहते हैं कि अगर तीसरे महीने गर्भपात हो जाता हो, तो ऐसी दशा में प्रसव के एक या दो मास पूर्व से अगर गर्भवती स्त्री को ऐक्टिया रेसिमोसा की ३x की मात्रा प्रति ३ घंटे सेवन कराई जाय, तो गर्भपात नहीं होता। सैबाइना भी तीसरे महीने के गर्भपात को रोकता है। पांचवें या सातवें महीने गर्भपात होता हो, तो सीपिया ३० की प्रति चार घंटे के बाद मात्रा सेवन कराई जाय तो गर्भपात नहीं होता। जिन स्त्रियों को स्वभावतः गर्भपात हो जाता है उन्हें वाइबरनम के मदर टिंचर के ४-५ बूंद प्रतिदिन देने चाहियें। 

डॉ० कैन्ट का कथन है कि यद्यपि अनेक बार ऐक्टिया रेसिमोसा के देने से प्रसव में आसानी हो जाती है, तो भी इसे रुटीन की तरह देना होम्योपैथी नहीं है। रोगी के अन्य लक्षणों को भी ध्यान में रखना चाहिये। यह ठीक है कि प्रसव के अन्तिम दिनों में इसे देने से प्रसव-पीड़ा में न्यूनता आती है।ऐक्टिया रेसिमोसा तथा कॉलोफाइलम-जैसे डॉ० क्लार्क ने ऐक्टिया रेसिमोसा के विषय में लिखा है कि प्रसव के कुछ दिन पहले इसे देने से प्रसव एक आसानी से हो जाता है, वैसे डॉ० डगलस बोरलैंड का कहना है कि प्रसव के मास पूर्व से कॉलोफाइलम की निम्न-शक्ति की एक मात्रा प्रतिदिन देने से प्रसव में कोई पीड़ा नहीं होती और बच्चा आसानी से हो जाता है।

(२) गठिया-इसका रोगी शीत-प्रधान होता है, सर्द और नम हवा से उसके शरीर में गठिये के रोग की दशा उत्पन्न हो जाती है, केवल मांसपेशियों और जोड़ों में ही दर्द नहीं होता, सारे शरीर में दर्द होने लगता है, स्नायु-मार्ग में, नसों में दर्द होता है। यकृत् और जरायु में भी नम-मौसम के शीत से दर्द होता है, सारे शरीर में इस शीत से दर्द होता है, परन्तु सिर में वह ठंडी हवा चाहता है। रोगी शीत-प्रधान-यह है-यह तो रोगी का 'व्यापक' (General) रूप है, परन्तु सिर ठंडक चाहता है-रोगी का 'एकांगी' (Particular) रूप है। यह हम पहले ही कह चुके हैं कि जब रोगी के शारीरिक-कष्ट-गठिये का दर्द आदि-दब जाते हैं तब उसके मानसिक कष्ट-हतोत्साह, निराशा, रुआई-आदि प्रकट होने लगते हैं, और जब उसके मानसिक-कष्ट प्रकट होते हैं तब उसके शारीरिक कष्ट दब जाते हैं।दृष्टि से इसे 'मूर्छा तथा वात-ग्रस्त प्रकृति' (Hysterio rheumatic constitution)का रोगी कह सकते हैं।

(३) इस औषधि के अन्य लक्षण-

1. प्रसव के बाद ठंड लग जाने से पागलपन या डिलीरियम इस-

i. प्रसव के बाद जरायु के नियमित संकोचन के न होने से मैले-पानी (Lochia)या नारबेल (Placenta) के न निकलने पर इसे दिया जाता है।

ii. जरायु में दर्द (Ulterine neuralgia) जो कभी एक और कभी दूसरी ओर जाता है, इसके लिये यह महौषध है। यदि यह दर्द दाई तरफ से बाई तरफ जाय,तो लाइकोपोडियम और अगर बाई तरफ से दाहिनी तरफ जाय, तो इपिकाक या लैकेसिस उपयोगी है।

iii. रजोधर्म की खराबी के कारण शरीर में बिजली के शॉक (धक्के) के समान स्नायु-शूल (Neuralgia) को यह ठीक करता है।

iv. जरायु से संबद्ध सिर-दर्द ऐक्टिया का सिर-दर्द आंख से शुरू होकर सिर की चोटी या उसके ठीक पीछे सिर की गुद्दी तक फैल जाता है; स्पाइलेजिया का सिर-दर्द सिर के पीछे की बाई तरफ से शुरू होकर, सिर के ऊपर चोटी से होता हुआ बाई आंख पर आ टिकता है। ऐक्टिया रेसिमोसा का सिर-दर्द दिन की अपेक्षा रात को अधिक होता है; इसके विपरीत स्पाइजेलिया का सिर दर्द दिन को अधिक होता है, सूर्योदय से प्रारंभ होता है और सूर्यास्त तक बना रहता है। प्रतिदिन ठीक एक ही समय बाई आंख के आस-पास दर्द हो तो सिडून उपयोगी है।

(४) शक्ति तथा प्रकृति-डॉ० कैन्ट कहते हैं कि यह औषधि ३०, २००,

१००० तथा इससे भी ऊंची शक्ति में अच्छा काम करती है। औषधि

'सर्द' - Chilly - प्रकृति के लिये है।

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एसेटिक एसिड-सिरका, (ACETIC ACID) use in hindi



एसेटिक एसिड-सिरका, (ACETIC ACID)

GENERALS AND PARTICULARS

व्यापक-लक्षण तथा मुख्य-रोग

(१) वंशानुगत क्षय-रोग एसेटिक एसिड-सिरका, (ACETIC ACID) MODALITIES प्रकृति लक्षणों में कमी (Better)

(२) रक्त स्राव

(३) शोथ पेट के बल लेटने से आराम लक्षणों में वृद्धि (Worse)

(४) बहुमूत्र चित्त लेटने से वृद्धि "ठंड से वृद्धि

(१) वंशानुगत क्षय-रोग (Hectic fever) - पुराने या वंशानुगत क्षय-रोग में जब सूकी खांसी आती हो, रात को पसीना आता हो, दस्त आते हों, फेफड़ से खून आता हो, फेफड़ों में घड़घड़ाहट होती हो, ज्वर आता हो, सीने और छाती में जलन हो-क्षय-रोग के इन लक्षणों में यह औषधि उपयोगी है। इस क्षय-रोग में हाथ-पैर की सूजन भी दिखाई दे सकती है।

(२) भिन्न-भिन्न अंगों से रक्त स्राव (Hemorrhage)-शरीर के किसी भी अंग से रक्त स्राव होता हो-नाक, पेट, गुदा, फेफड़े, गला, अत्यधिक मासिक-धर्म तथा गर्भाशय। रक्त-स्राव में चायना के बाद अच्छा काम करती है। बवासीर अधिक रुधिर जाने पर यह दी जा सकती है।

(३) शोथ-रोगी धड़ से क्षीण होता जाता है, परन्तु पांवों तथा टांगों में शोध होती जाती है। शोध में डिजिटेलिस के बाद यह अच्छा काम करती है।

(४) बहुमूत्र-बहुमूत्र रोग में चाहे शक्कर आती हो या न आती हो, अत्यन्त प्यास लगती हो, कमजोरी हो, शरीर पीला पड़ता जाता हो, शरीर का मांस छँटता जाता हो तब इससे लाभ होता है।

(५) इस औषधि के अन्य लक्षण-

(i) क्लोरोफार्म के बाद की दुर्बलता को यह दूर कर देती है।

(ii) गर्भावस्था के समय दिन-रात मुंह में पानी आने को ठीक करती है।

(६) शक्ति, प्रकृति तथा संबंध-३ से ३० शक्ति व्यवहार में आती है। यहऔषधि गूढ़ क्रिया करने वाली है, एक महीने तक इसका असर रह सकता है,इसलिये इसका अधिक बार प्रयोग ठीक नहीं। औषधि 'सर्द' - Chilly - प्रकृति के रोग के लिये है। क्लोरोफार्म, कोयले या गैस के धुएँ, अफीम और धतूरे के दुष्परिणाम को दूर करती है। रक्तस्राव में चायना और शोथ में डिजिटेलिस के बाद अच्छा कार्य करती है। आर्निका, बैल, लैके, मर्क के साथ नहीं चलती।होती हो, रोगी क्षीण होता जाता हो, ज्वर आता हो, सीने और छाती में जलन होती हो, रोगी क्षीण होता जाता हो, भूख न रहे, कमजोरी बहुत अधिक महसूस होती |

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एब्रोटेनम (ABROTANUM) use in hindi



एब्रोटेनम (ABROTANUM) 

GENERALS AND PARTICULARS)

व्यापक-लक्षण तथा मुख्य-रोग

(१) बच्चे के सूखे के रोग में नीचे से सूखना (Marasmus)-बच्चे के सूखे के रोग में इस औषध की बहुत अधिक उपयोगिता है। इस औषधि के सूखे में सब से पहले नीचे के अंगों में दुबलापन आना शुरू होता है, सूखापन नीचे से ऊपर की तरफ चढ़ता है। चेहरा सब से बाद को सूखने लगता है।

(सूखे के रोग में मुख्य-मुख्य औषधियां)

एब्रोटेनम-सबसे पहले टांगे सूखनी शुरू होती हैं, ऊपर का धड़ बाद में।सार्सापैरिला तथा लाइको-सबसे पहले ऊपर का भाग दुबला होना शुरू होता है, खासकर गर्दन दुबली हो जाती है, निचला भाग ठीक बना रहता है। इसके अतिरिक्त लाइको के सूखे में इस औषधि के अन्य लक्षण-जैसे ४ से ८ के बीचलक्षणों में वृद्धि आदि-रोगी में रह सकते हैं।

नैट्रम म्यूर - इसमें लाइको की ही तरह पहले ऊपर का भाग दुबला होना शुरू होता है, निचला भाग ठीक बना रहता है, ख़ासकर गर्दन दुबली हो जाती है। इसके अतिरिक्त नैट्रम म्यूर के अन्य लक्षण-जैसे नक्शा बनी-सी चित्रित जिह्वा, नमक खाने की उत्कट इच्छा, खाने के बाद थकावट, खाने के बाद सोना आदि-हो सकतेहैं।

आयोडियम-इसमें सारा शरीर सूखता जाता है, मुँह पर झुर्रियां पड़ जाती हैं।पुष्टिकारक भोजन खाने पर भी बच्चा सूखता जाता है। दिन भर खाने को मांगता है। खाने के बाद तकलीफों को भूल जाता है इसका रोगी पेट भर जाने के बाद नैट्रम म्यूर की तरह थकावट नहीं, आराम अनुभव करता है।

सिफ़िलीनम-इसमें भी सारा शरीर क्षीण हो जाता है, बाल झड़ने लगते हैं,सूर्यास्त से सूर्योदय तक रात्रि के समय रोगी के लक्षण बढ़ जाते हैं।

अर्जेन्टम नाइट्रिकम- इसका भी सारा शरीर सूख जाता है, मुँह पर झुर्रियां पड़ जाती हैं। सूखे-रोग में मिठाई खाने की इच्छा प्रबल होती है। मीठे के लिये विशेष रुचि इस औषधि का प्रधान लक्षण है।

कैलकेरिया कार्ब - इस औषधि के सूखे-रोग में सिर और पेट बहुत बड़े होते हैं, गर्दन और पैर बहुत पतले होते हैं। सोने पर सिर पर पसीना बहुत आता है। अंडे खाने की इच्छा प्रबल होती है। शरीर थुलथुला होता है। पसीने से खट्टी बू आती है। बच्चे को जहाँ बैठा दिया जाय वहीं पड़ा रहता है, चलना-फिरना जल्दी नहीं सीख पाता। जिन लोगों के यहां अंडा नहीं खाया जाता वहां बच्चा चाक, मिट्टी खाया करता है।

इथूज़ा- इस औषधि के सूखे में बच्चा दूध पीते ही उलट देता है। सूखे के लक्षणों में दूध को पेट में न रख सकने के लक्षण में यह औषधि उपयोगी है।एण्डिटम क्रूड - इस औषधि में भी बच्चा दूध या भोजन की उल्टी कर देता है, परन्तु उसके साथ पतले दस्त भी आते हैं, जीभ पर अत्यन्त सफेद लेप रहता है, और बच्चा चिड़चिड़ा होता है।बैराइटा कार्ब - सूखे की अन्य शारीरिक अवस्थाओं के साथ अगर बच्चे का मानसिक विकास भी बौनापन लिये हो, शारीरिक तथा मानसिक दोनों प्रकार से बच्चा बौना हो, अविकसित हो, और गले तथा अन्य स्थानों में गिल्टियां हों, तो यह औषधिअच्छा काम करती है।

सिना-अगर सूखे के साथ बच्चे की गुदा में खुजली होती हो, बिस्तर में पेशाब कर देता हो, पेट में कृमि हों, बार-बार नाक को उंगली से खुजलाता हो. अत्यंत चिड़चिड़ा स्वभाव हो, झूले में लगातार झुलवाना चाहता हो, तो सूके में इस औषधि को स्मरण करना चाहिये।

पैट्रोलियम-सूखे में अगर बच्चे को ऐसे छसत आते हों तो कि वह रात में तो ठीक रहता हो और दिन में दस्तों से परेशान रहता हो, तो इस विलक्षण-लक्षण में पैट्रोलियम काम देता है। इसके अतिरिक्त रोगी के सांस और मल से प्याज की गन्ध आती है, ठंडी हवा से कतराता है और उसमें एग्जीमा की प्रवृत्ति होती है।

फॉसफोरस - इसके सूखे में ऐसे दस्त आते हैं जैसे नल से पानी एकदम झरे।साइलीशिया-बड़ा सिर और सारा शरीर सूखा हुआ, सोने पर माथे पर पसीना और शरीर सूखा ।

सलफर - सूखे में इस औषधि की अन्य औषधियों की अपेक्षा अधिक आवश्यकता पड़ती है। सलफर का रोगी अत्यन्त गन्दा, मलिन होता है। जगह-जगह फोड़े-फुंसियां, ग्रन्थियां बढ़ी हुई, सख्त कब्ज़ या लगतार कै-दस्त, शरीर से बदब आना-ये ऐसे लक्षण हैं, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता। सब अंग सूखते जाते हैं, पेट फूलता जाता है, पेट में जलन होती है, गुड़गुड़ होती है, गर्दन, पीठ, छाती की मासपेशियां और सब अंग सूखते जाते हैं, पेट की मांसपेशियां भी सूखती है परन्तु पेट फूल जाता है कैलकेरिया कार्ब में भी पेट फूलता है।

ट्यूबरक्युलीनम-सूखे की अन्य औषधियों में हमने देखा कि पुष्टकर भोजन लेने पर भी रोगी दुबला होता जाता है। खाता-पीता है परन्तु साथ ही थका रहता है।प्रतिदिन कमजोर हो जाता है। ऐसी अन्य औषधियों के प्रयोग से लाभ न हो, तो ट्यूबरक्युलीनम लाभ करता है।

(२) एक बीमारी के दबने से दूसरी बीमारी का खड़े हो जाना (Metastasis)— प्रायः देखा जाता है कि जब एक बीमारी हटती है तब दूसरी बीमारी उठ खड़ी होती है। ऐसी स्थिति में एब्रोटेनम लाभ करता है। उदाहरणार्थ-

(i) गठिक के रोगी को यदि पतले 'दस्त आते रहें तो दर्द कम हो जाता है और अगर कब्ज़ हो जाय तो दर्द बढ़ जाता है !

(ii) कर्णमूल (Mumps) की सूजन दब जाने से पुरुषों में पाते तथा स्त्रियों में स्तन की सूजन हो जाती है।

(iii) मालिश द्वारा गठिये के दब जाने से दिल की तकलीफ हो सकती है।

(iv) गठिया या दस्त ठीक होने पर बवासीर के लक्षण उभर आते हैं।

(v) दस्त एकदम बन्द कर देने पर गठिया हो जाता है।

(३) एब्रोटेनम और पल्सेटिला में भेद-एक रोग के हटने पर दूसरे रोग क हो जाने में एब्रोटेनम और पल्साटला दोनों काम आते हैं, परन्तु इन दोनों में भेद यह है कि जहाँ एब्रोटेनम में एक रोग के दबने से दूसरा जो रोग पैदा होता है उसका पहले रोग से कोई सम्बन्ध नहीं होता, वहाँ पल्सेटिला में जो रोग दबा है वही दूसरी स्थान में चला जाता है। उदाहरणार्थ, एब्रोटेनम में दस्त दबकर गठिया हो सकता है. बवासीर हो सकती है; कर्णमूल की सूजन दब कर पोते बढ़ सकते हैं। इस प्रकार जो रोग पैदा हो जाता है उसे एलोपैथ एक नया रोग कहते हैं, परन्तु होम्योपैथी में इसे नया रोग न कह कर पुराने रोग का ही रूपान्तर मानते हैं।

पल्सेटिला में गठिये का दर्द जब अपना स्थान बदलता है, तब एक जोड़ से दूसरे जोड़ में चला जाता है, अगर सूजन है तो एक गिल्टी से दूसरी गिल्टी में चली जाती है, अगर दर्द है तो एक अंग से दूसरे अंग में चला जाता है पल्सेटिला में रोग वही रहता है, केवल स्थान बदलता है; एब्रोटेनम में रोग अपना रूप ही बदल देता है,एलोपैथिक परिभाषा में पहला रोग दब कर एक नया रोग बन जाता है, यद्यपि होम्योपैथी के अनुसार वह नया रोग न होकर पुराने रोग का ही रूपान्तर होता है।

(४) इस औषधि के अन्य लक्षण-

(i) बच्चों की अण्ड - वृद्धि (Hydrocele) में यह औषधि लाभ होती है।

(ii) बच्चों की नाल से खून बहने को यह रोकती है।

(iii) बच्चों की नकसरी में यह लाभप्रद है।

(५) शक्ति, प्रकृति, तथा संबंध - ३ से ३०; औषधि 'सर्द'- Chilly — प्रकृति के लिये है। प्लुरिसी में एकोनाइट और ब्रायोनिया के बाद अच्छा करता है।

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एबिस नाइग्रा (ABIES NIGRA) use in hindi



एबिस नाइग्रा (ABIES NIGRA)

GENERALS AND PARTICULARS

व्यापक - लक्षण तथा मुख्य-रोग

(१) खाने के बाद पेट दर्द बढ़ जाना - डॉ० गुएरेन्सी का कथन है कि जिन व्यक्तियों का खाने के बाद पेट दर्द बढ़ जाता है, उनके लिये यह उत्तम औषध है।एनाकार्डियम में खाने के बाद पेट दर्द घट जाता है

(२) पेट के ऊपरी हिस्से (cardiac region) में उबले हुए अंडे की-सी किसी चीज़ का अटका होना अनुभव करना-रोगी अनुभव करता है कि पेट के ऊपरी हिस्से में कोई चीज़ अटकी पड़ी है जो दर्द करती है। ऐसा अनुभव होता है कि पेट के ऊपरी भाग में उबले हुए अंडे की-सी कोई कड़ी चीज़ अटकी पड़ी है, जो न बाहर आती हैं, न नीचे उतरती है, वहीं अड़ी हुई है। 'वक्षोस्थित '(Sternum) के नीचे के भाग में इस प्रकार की कोई चीज अटकी अनुभव हो, तो चायना से लाभ होता है। अगर ऐसा अनुभव हो कि जो कुछ खाया है वह पेट के ऊपर के हिस्से में अटका पड़ा है, तो पल्सेटिला या ब्रायोनिया से लाभ होता है।

(३) वृद्ध-व्यक्तियों की बदहजमी की बीमारी - वृद्ध व्यक्तियों की इस बदहज़मी की बीमारी में, जहाँ साथ ही हृदय के लक्षण भी दिखाई देते हों,औषधि का प्रयोग होता है। इनकी बदहजमी का कारण चाय अथवा तम्बाकू का अधिक सेवन हो सकता है।

(४) चाय तथा तम्बाकू के सेवन के बुरे परिणाम-जो लोग चाय अथवा तम्बाकू के अधिक सेवन के फलस्वरूप पेट की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं. उनमें प्रायः देखा जाता है कि वे उत्साहहीन हो जाते हैं, रात को सो नहीं सकते।उनके लिये यह औषधि उपयोगी है।.

(५) प्रातःकाल भूख बिल्कुल न लगना, दोपहर तथा रात को कड़ी भूख लगना-जिन लोगों को प्रातःकाल बिल्कुल भूख नहीं लगती, परन्तु दोपहर और रात को भोजन की उत्कट इच्छा होती है उनके लिये सह औषध उपयोगी है।

(६) छाती में कुछ अड़ा हुआ पदार्थ अनुभव होना-छाती में दर्द अनुभव होना, ऐसा प्रतीत होना कि छाती में कुछ अटका हुआ है जो खांसने से निकल जाना चाहिये। जैसे पेट में कुछ अटका-सा अनुभव होता है, वैसे छाती में भी कफ़ जैसी कोई चीज़ अटकी अनुभव होती है।

(७) इस औषधि के अन्य लक्षण-

(i) पीठ के नीचे के भाग में दर्द (Pain in small of back)

(ii) हड्डियों में वात-रोग का दर्द (Rheumatic bone pains)

(iii) पुराना मलेरिया; ज्वर में गर्मी-सर्दी का एक-दूसरे के बाद आना-जाना

(iv) रात को नींद न आने के साथ भूख लगना ।

(८) शक्ति - १, ६, ३0


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एबिस कैनेडैनसिस (ABIES CANADENSIS) use in hindi



एबिस कैनेडैनसिस (ABIES CANADENSIS)

GENERALS AND PARTICULARS

व्यापक-लक्षण तथा मुख्य-रोग

(१) अजीर्ण; पाचन-क्रिया की गड-बड़ी; खरोच जैसी भूख लगना;भूख से ज्यादा खा जाना-

(२) जरायु का अपने स्थान से हटना

(Uterine displacement)

(३) बेहद कमजोरी

(Great debility)

(४) कमज़ोरी में एबिस की जेलसी-मियम से तुलना

(५) दायें कन्धे की फलकास्थि में दर्द

(६) ज्वर में ठंड से कांपना; कन्धों के बीच ठंडे पानी का-सा अनुभव

(७) अचार, गाजर, शलजम आदि खाने की चाह

(१) अजीर्ण; पाचन-क्रिया की गड़बड़ी; खरोचने जैसी भूख लगना; भूख से ज्यादा खा जाना-डॉ० क्लार्क का कथन है कि पाचन-क्रिया पर इस औषध का विशेष प्रभाव है। पेट में खरोचने जैसी भूख लगती है। इस खुरचन के कारण रोगी भूख से ज्यादा खा जाता है, उसे पता नहीं लगता कि कितना खा गया है। रोगी इतना खा जाता है कि पेट फूल उठता है जिसके दबाव से हृदय की क्रिया तेज होने लगती है। पेट की गैस से हृदय की गति में बाधा पड़ती है, हृदय - स्पंदन (Palpitation) होने लगता है।

(२) जरायु का अपने सथानू से हटना (Uterine displacement) – जरायु के अपने स्थान से हटने पर इसका प्रयोग लाभकारी है। जरायु में अग्रभाग में हल्का-हल्का एसा दर्द अनुभव होता है जो दुबाने से या चलने के कारण दबाव पड़ने से कम हो जाता है। गर्भाशय कोमल तथा कमजोर अनुभव होता है।

३) बेहद कमजोरी (Great debility) - रोगी बेहद कमजोरी अनुभव करता है। हर समय लेट रहना चाहता है। इस प्रकार की कमजोरी के कारण रोगी सुस्त रहता है। यह सुस्ती जेलसीमियम में भी पायी जाती है, परन्तु इन दोनों की कमजोरी तथा सुस्ती में भेद है।

(४) कमजोरी में एबिस की जेलसीमियम से तुलना-इसकी कमजोरी तथा सुस्ती का कारण अधिक खाना और उसका शरीर में न लगना है; जैल्स की सुस्ती का कारण मांस-पेशियों की कमजोरी, उनकी शिथिलता है।

(५) दायें कन्धे की फलकास्थि में दर्द होना (Pain in the right Shoulder blade)- इस औषध का एक लक्षण यह है कि दायें कन्धे की फलकास्थि में दर्द होता है। चैलीडोनियम में भी दायें कन्धे की फलकास्थि में दर्द होता है। अगर दायें कन्धे की फलकास्थि के नीचे के बिन्दु में दर्द का रोग पुराना हो तो लाइकोपोडियम से लाभ होता हैं। इस प्रकार का दर्द बाय फलकास्थि में हो तो औग्लेजिक एसिड पर ध्यान देना चाहिये।

(६) ज्वर में ठंड से कांपना; कंधों के बीच ठंडे पानी का सा अनुभव - ज्वर में रोगी को ऐसा अनुभव होता है मानो नाडियों में बर्फ-का-सा ठंडा रुधिर बह रहा है। रोगी सर्दी से कांपता है। हाथ तथा त्वचा ठंडी हो जाती हैं। पीठ में ऊपर से नीचे की तरफ ठंड चलती है। कन्धों के बीच ठंडे पानी का-सा अनुभव होता है।

(७) अचार, गाजर, शलजम आदि खोन की इच्छा-रोगी को आचार ,गाजर, शलजम आदि तथा मोटे अन्न खाने की इच्छा होती है। अगर किसी रोग में बेहद कमजोरी हो, रोगी को ठंड लगे, खरोचने-जैसी भूख लगे, अचार-चटनी ,गाजर- शलजम के खाने की उत्कट इच्छा हो, तो इस औषधि से लाभ होगा।

(८) शक्ति - ६, ३०, २००


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एलूमेन-फिटकरी, (ALUMEN) use in hindi

एलूमेन-फिटकरी, (ALUMEN) GENERALS AND PARTICULARS व्यापक-लक्षण तथा मुख्य-रोग (१) मलद्वार में लकवे-की-सी कमज़ोरी (२) मूत्राशय में प...